चाय : ' कुछ भी नहीं है इसके तुल्य '
कहते है समुद्र मंथन हुआ था जब '१४ रत्नों ' का उत्पाद हुआ था तब रत्न थे वो अनमोल बहुत उसमे ही एक का नाम था अमृत कुछ बुँदे पीते ही अमृत की शरीर में नयी जान चली आय आज भी पृथ्वी पे मौजूद है वो अमृत कलयुग में नाम उसका पड़ गया चाय दिन भर कर के काम जब थक जाती है जान तब एक प्याला चाय का उतार दे सारी थकान ये चाय न होती तो जिंदगी क्या होती बिना पानी के जैसे सूखे रेगिस्तान सी होती वो आमिर - गरीब...