चाय : ' कुछ भी नहीं है इसके तुल्य '


कहते है समुद्र  मंथन  हुआ  था  जब
'१४ रत्नों ' का  उत्पाद  हुआ  था  तब
 रत्न   थे   वो   अनमोल    बहुत
उसमे  ही  एक  का  नाम  था अमृत 


कुछ   बुँदे  पीते  ही  अमृत  की 
शरीर  में  नयी  जान  चली  आय
आज  भी  पृथ्वी  पे  मौजूद  है  वो अमृत
कलयुग  में  नाम  उसका  पड़  गया  चाय


दिन  भर  कर  के  काम
जब  थक  जाती  है  जान
तब  एक  प्याला चाय  का 
उतार दे   सारी  थकान 


ये  चाय  न  होती 
तो  जिंदगी  क्या  होती 
बिना  पानी  के  जैसे 
सूखे  रेगिस्तान  सी  होती



वो  आमिर - गरीब  नहीं  देखती
हर  एक  में  समान  बटती है 
गांव  हो  या  शहर  हो 
हर  नुक्कड़  पे   वो  मिलती  है


व्हेज  नॉन- व्हेज के  बात  पर 
जहा   समाज  बटता  है 
चाय  ही  वो  चीज़  है 
जो  सबको  एक  करता  है



कोई  कुछ  भी  कहे 
चाय  एक  नशा  है 
बढ़ती  उम्र  के  साथ
ये   नशा  भी  बढ़ता  है 



आदमी  बदलते   वक़्त  के  साथ
कभी  लोग  छोड़  भी जायेंगे
लेकिन  हर  लम्हा  साथ  देगी  चाय  
जब  जरुरत  होगी  साथ  पाएंगे



 कोई   पेय   नहीं  है  इस  जैसा
कुछ  भी  नहीं  है  इसके  तुल्य
फिर   भी   कोई   नहीं   घमंड   इसे  
इतनी  ख़ास  होके भी केवल  ५ रुपये मूल्य



                                  :   एक चायप्रेमी





PC ;   Siddhant Mahajan  (Imago world)

























  

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